हो सकता है कि आपको रेडियोवाणी की कई पुरानी पोस्टों पर प्लेयर नज़र ना आए । उन्हें दुरूस्त करने का काम एक तिहाई पूरा हो चुका है । रेडियोवाणी पर कुल लगभग तीन सौ पोस्टें हैं । आशा है हम शीघ्र ही सारी पोस्टों को दुरूस्त कर देंगे ।
संगीत की दुनिया कितनी अद्भुत है। एक अनंत-समुद्र है सुरों का। जिसमें आप चाहे जितनी गहरी डुबकी लगा सकते हैं। हर बार आपके सामने कुछ नया और अद्भुत होगा। रेडियो की पेशेवर जिंदगी में हम गानों के आसपास ही रहते हैं या ये कहें कि गाने हमारे आसपास गूंजते रहते हैं। लेकिन इतने से भला कहां प्यास बुझती है। रेडियो-चैनलों का अपना एक फॉरमेट होता है। श्रोताओं की अपनी मांग....बाज़ार में टिके रहने की कवायद। इन सबके बीच भी अपने मन के संगीत की जगह बची रहती है। शायद यही जिद और प्यास थी जिसने हमें आज से छह साल पहले 'रेडियोवाणी' शुरू करने को प्रेरित किया था।
तब पता नहीं था कि इस ब्लॉग की दशा और दिशा क्या होगी। पर बीते इन कुछ बरसों में 'रेडियोवाणी' ने अपना एक अलग रास्ता तैयार किया है। ब्लॉगिंग ने हमारी अपनी जिंदगी को कई मायनों में बदला है। संगीत के दीवानों की एक ऐसी टोली तैयार की है--जो हर बार कोई नया सुर, कोई नई गूंज पेश करती है। कोलाहल भरे इस जीवन में भला और क्या चाहिए। हालांकि पिछले कुछ बरसों में हमारी अपनी ब्लॉगिंग की रफ्तार कम हुई है। निजी जीवन में एक भोले-तोतले और शरारती सुर ने हमारे पलों और दिनों को अपनी प्यारी गिरफ्त में लिया है। और हमें इससे कोई शिकायत नहीं।
'रेडियोवाणी' अभी भी हमारी प्राथमिकता है और रहेगा। हमारे मित्र और अजीज़ 'डाक-साब' ने कल उलाहना दिया कि दूसरा बच्चा आने के बाद पहली संतान से मोह कम हो जाता है। अपनी संतान 'रेडियोवाणी' के प्रति हमारा मोह कम नहीं हुआ...हां जेब में समय के सिक्के कम हो गये। हालांकि गये कुछ बरसों में ब्लॉगिंग का उफ़ान कम हुआ है। पर मनीष जैसे मनीषी पूरी ताक़त के साथ डटे हैं। उम्मीद करें कि मनीष से प्रेरणा पाकर हम भी कम से कम हफ्ते में एक पोस्ट वाली पुरानी रफ्तार पर लौट आयें।
'रेडियोवाणी' की सालगिरह पर हम पंडित नरेंद्र शर्मा, सुधीर फड़के और लता मंगेशकर के त्रिवेणी-संगम को नमन कर रहे हैं। ये गाना आज से सड़सठ साल पहले आया था। घनघोर पतन के इस कोलाहल भरे युग में कविताई वाले गीतों के लिए बहुधा हमें आधी सदी पीछे लौटना पड़ता है। ललित-भावों का इस तरह मद्धम पड़ते जाना बहुत अफ़सोस का विषय है। तीन मिनिट बाईस सेकेन्ड के इस गाने को आप जीवन की आपा-धापी के बीच थोड़ा अंतराल निकालकर सुनिए। मुझे यक़ीन है कि सितार की शुरूआती धुन से लेकर एकदम आखिर में लता के 'दूर जाना ना' गाने तक...आपके भीतर कुछ बदल जायेगा। आपको ख़ुशी की एक फांक मिल जायेगी।
इस गाने की सादी-सी धुन है। लता जी ने अपनी नाज़ुक आवाज़ में अलफ़ाज़ को कुछ इस तरह बरता है कि गाना एक अनमोल रतन बन गया है। दिलचस्प बात ये है कि सुधीर फड़के ने किसी आयोजन में इसे स्वयं भी गाया। इसलिए यहां हम दोनों संस्करण प्रस्तुत कर रहे हैं। मक़सद यही है कि एक संगीतकार की परिकल्पना और गायक के किसी गीत को अपने तरीक़े से बरतने के बीच कितने परिवर्तन होते हैं।
पंडित नरेंद्र शर्मा की कविताई को भी हमारा नमन है। कितने कम शब्द। कितनी गहन अनुभूतियां। Song: bandh preet phool dor Film: Malti Madhav (1951) Singer: Lata mangeshkar Lyrics: Pandit Narendra Sharma Music: Sudhir Phadke Duration: 3 22
बांध प्रीती फूल डोर मन ले के चितचोर दूर जाना ना।। मन की किवाड़ खोल, मीत मेरे अनमोल भूल जाना ना।। कैसे सहूं विछोह मन मे रमा है मोह रूठ जाना ना।। सुधीर फड़के के संस्करण में ये पंक्तियां अतिरिक्त हैं नैन मिले मन मिल गये, मिलकर बिछड़े मीत व्याकुल लतिका मालती फूल विरह का गीत
रेडियोवाणी की छठी सालगिरह कारवां में शामिल सभी मित्रों को मुबारक हो।
(मुहूर्त के मुताबिक़) आज और कल मौनी-अमावस्या है। इलाहाबाद में कुंभ 2013 के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक। 'रेडियोवाणी' पर रेडियो-सखी ममता सिंह इस अतिथि-पोस्ट में इलाहाबाद, अमावस्या के मेले, कैलाश गौतम, उनकी कविताई और अन्य कई स्मृतियों को सहेजकर लायी हैं।
कुंभ चल रहा है, एक बार महाकुंभ नहाने का मौक़ा पा चुकी हूं। उस वक्त गांव धौरहरा में थी। गांव से जो ट्रेन आती थी....वो लगातार भीड़-भभ्भड़ से परिपूर्ण होती थी। मां को भीड़ से घबराहट होती थी। पहले तो वो ट्रेन में चढ़ ही ना पायीं। दूसरे दिन जैसेसिंह -तैसे कोशिश करके भाईयों ने मिलके ट्रेन में तो चढ़ा दिया। बाप रे....दमघोंटू भीड़ का ऐसा आलम...पहले कभी ना देखा था। बहरहाल....आते हैं महाकुंभ और गंगा-स्नान पर। पैदल चलते-चलते हालत ख़राब हो गयी। नन्हें नन्हें पैर बुरी तरह पस्त हो चुके थे। ख़ैर..पानी का आकर्षण भी था और डर भी। नौका में ठुस्सम-ठुस्सा सवार हुए। संगम पहुंचे। पानी में उतार दिया गया। एक तरफ मां ने हाथ पकड़ा, दूसरी तरफ पिता जी ने। उफ....इतना ठंडा पानी कि उसे शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। समझ लीजिए कि करंट-सा लग गया। और उस पर डुबकी पूरे सिर की ही होनी चाहिए। तभी गंगा-स्नान पूरा होता है। जैसे ही मां-पिताजी ने मेरा सिर नहाने के लिए गंगा में डुबोया--एक ज़ोरदार चीख़ निकली। अगल-बगल के लोग हंसने लगे। धीरे-धीरे डर और ठंडक का असर कम हुआ।
बहरहाल...आज याद कर रहे हैं वो दिन। और कैलाश गौतम की वो कविता याद आ रही है--जिसमें उन्होंने जैसे 'अमावस्या के मेले' को उतारकर रख दिया है। कविता नहीं शब्द-चित्र है। शब्द-चित्र नहीं पटकथा है। पटकथा नहीं--सजीव-प्रसारण है। जो कुछ भी है अदभुत है। अनमोल है। अद्वितीय है। चूंकि मेरा ताल्लुक आकाशवाणी इलाहाबाद से रहा है। इसलिए अनगिनत छबियां और यादें हैं कैलाश जी की। बेहद ख़ुशमिज़ाज, हंसमुख व्यक्तित्व। उनमें एक देसीपन नज़र आता था। एक ऐसी आत्मीयता थी उनमें...कि बहुत कम मुलाक़ातों में भी बहुत अज़ीज़ लगते थे। होठों पर हमेशा मुस्कान होती थी।
'कृषि-जगत' कार्यक्रम के 'कैलाश भैया' बड़े 'हंसैया' थे। हमें उनसे बात करते हुए इसलिए डर लगता था क्योंकि वो उम्र में बड़े थे। और बेहद मशहूर भी। माइक्रोफोन के सामने इतनी सहजता से बैठते थे कि लगता नहीं था...कार्यक्रम कर रहे हैं। बस बैठते और शुरू हो जाते। और हम देखते रह जाते। एक तरह से उन्हें देखकर प्रसारण की कुछ बारीकियां सीखने मिली हैं।
मुंबई में 'परिवार काव्योत्सव' में कैलाश जी के आने की ख़बर मिली तो भागी-भागी गयी उन्हें सुनने के लिए। मरीन लाइंस के उस सभागार में अन्य कवियों की मौजूदगी के बावजूद भीड़ जैसे ही एक ही मक़सद लेकर आई थी। कैलाश गौतम को सुनने की। ज़ाहिर है उन्हें लगभग अन्त में बुलाया गया। और फिर 'बड़की भौजी' और 'अमावस्या का मेला' ने धूम मचा दी। ये भी याद आता है कि मुंबई से एक बार उनसे फोन पर बातें हुईं और उन्होंने कहा था कि अगली बार इलाहाबाद आओ, तो ज़रूर मिलो। लेकिन मेरा दुर्भाग्य...वो मौक़ा आ ही ना सका।
जब 'जादू' आने वाले थे--तो इलाहाबाद से डॉक्टर-भैया ने यश मालवीय जी के सौजन्य से कैलाश गौतम की एक सी.डी. भेजी थी। जो उन मुश्किल भरे दिनों में बहुत सुनी थी।
जब भी 'अमावस्या का मेला' सुनती हूं...इलाहाबाद...बचपन...कैलाश भैया और एक साथ कई दृश्य आंखों के सामने आ जाते हैं। आज 'मौनी-अमावस्या' के अवसर पर इस अनमोल-रचना को साझा करने से खुद को रोक नहीं पाई। अगर आप इलाहाबाद में हैं तो जाईये मेले में हो आईये। और अगर इलाहाबाद से दूर हैं--तो इसे सुनिए और हो आईये। डॉक्टर-भैया का धन्यवाद इस सीडी के लिए।
ई भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा धरम में करम में सनल गाँव देखा अगल में बगल में सगल गाँव देखा अमवसा नहाये चलल गाँव देखा॥ एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा अ कान्ही पे बोरी, कपारे पे बोरा अ कमरी में केहू, रजाई में केहू अ कथरी में केहू, दुलाई में केहू अ आजी रंगावत हईं गोड़ देखा हँसत हउवैं बब्बा तनी जोड़ देखा घुँघुटवै से पूँछै पतोहिया कि अइया गठरिया में अबका रखाई बतइहा एहर हउवै लुग्गा ओहर हउवै पूड़ी रमायन के लग्गे हौ मड़ुआ के ढूँढ़ी ऊ चाउर अ चिउरा किनारे के ओरी अ नयका चपलवा अचारे के ओरी अमवसा क मेला अमवसा क मेला इहइ हउवै भइया अमवसा क मेला॥
मचल हउवै हल्ला चढ़ावा उतारा खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारा एहर गुर्री-गुर्रा ओहर लोली-लोला अ बिच्चे में हउवै सराफत से बोला चपायल हौ केहू, दबायल हौ केहू अ घंटन से उप्पर टंगायल हौ केहू केहू हक्का-बक्का केहू लाल-पीयर केहू फनफनात हउवै कीरा के नीयर अ बप्पारे बप्पा, अ दइया रे दइया तनी हमैं आगे बढ़ै देत्या भइया मगर केहू दर से टसकले न टसकै टसकले न टसकै, मसकले न मसकै छिड़ल हौ हिताई नताई क चरचा पढ़ाई लिखाई कमाई क चरचा दरोगा क बदली करावत हौ केहू अ लग्गी से पानी पियावत हौ केहू अमवसा क मेला अमवसा क मेला इहइ हउवै भइया अमवसा क मेला॥
जेहर देखा ओहरैं बढ़त हउवै मेला अ सरगे क सीढ़ी चढ़त हउवै मेला बड़ी हउवै साँसत न कहले कहाला मूड़ैमूड़ सगरों न गिनले गिनाला एही भीड़ में संत गिरहस्त देखा सबै अपने अपने में हौ ब्यस्त देखा अ टाई में केहू, टोपी में केहू अ झूँसी में केहू, अलोपी में केहू अखाड़न क संगत अ रंगत ई देखा बिछल हौ हजारन क पंगत ई देखा कहीं रासलीला कहीं परबचन हौ कहीं गोष्ठी हौ कहीं पर भजन हौ केहू बुढ़िया माई के कोरा उठावै अ तिरबेनी मइया में गोता लगावै कलपबास में घर क चिन्ता लगल हौ कटल धान खरिहाने वइसै परल हौ अमवसा क मेला अमवसा क मेला इहइ हउवै भइया अमवसा क मेला॥
गुलब्बन क दुलहिन चलैं धीरे-धीरे भरल नाव जइसे नदी तीरे-तीरे सजल देह हौ जइसे गौने क डोली हँसी हौ बताशा शहद हउवै बोली अ देखैलीं ठोकर बचावैलीं धक्का मनै मन छोहारा मनै मन मुनक्का फुटेहरा नियर मुस्किया-मुस्किया के ऊ देखेलीं मेला सिहा के चिहा के सबै देवी देवता मनावत चलैंलीं अ नरियर पे नरियर चढ़ावत चलैलीं किनारे से देखैं इशारे से बोलैं कहीं गांठ जोड़ैं कहीं गांठ खोलैं बड़े मन से मन्दिर में दरसन करैलीं अ दूधे से शिवजी क अरघा भरैलीं चढ़ावैं चढ़ावा अ गोठैं शिवाला छुवल चाहैं पिन्डी लटक नाहीं जाला अमवसा क मेला अमवसा क मेला इहइ हउवै भइया अमवसा क मेला॥
बहुत दिन पर चम्पा चमेली भेटइलीं अ बचपन क दूनो सहेली भेंटइलीं ई आपन सुनावैं ऊ आपन सुनावैं दूनों आपन गहना गदेला गिनावैं असों का बनवलू असों का गढ़वलू तू जीजा क फोटो न अब तक पठवलू न ई उन्हैं रोकैं न ऊ इन्हैं टोकैं दूनौ अपने दुलहा क तारीफ झोकैं हमैं अपनी सासू क पुतरी तू जान्या अ हम्मैं ससुर जी क पगरी तू जान्या शहरियों में पक्की देहतियो में पक्की चलत हउवै टेम्पो चलत हउवै चक्की मनैमन जरै अ गड़ै लगलीं दूनों भयल तू-तू मैं-मैं लड़ै लगली दूनों अ साधू छोड़ावैं सिपाही छोड़ावै अ हलुवाई जइसे कराही छोड़ावैं अमवसा क मेला अमवसा क मेला इहइ हउवै भइया अमवसा क मेला॥
कलौता क माई क झोरा हेरायल अ बुद्धू क बड़का कटोरा हेरायल टिकुलिया क माई टिकुलिया के जोहै बिजुलिया क भाई बिजुलिया के जोहै माचल हउवै मेला में सगरों ढुंढाई चमेला क बाबू चमेला का माई गुलबिया सभत्तर निहारत चलैले मुरहुवा मुरहुवा पुकारत चलैले अ छोटकी बिटिउवा क मारत चलैले बिटिउवै पर गुस्सा उतारत चलैले गोबरधन क सरहज किनारे भेंटइलीं गोबरधन के संगे पउँड़ के नहइलीं घरे चलता पाहुन दही-गुड़ खियाइत भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइत उहैं फेंक गठरी परइलैं गोबरधन न फिर-फिर देखइलैं धरइलैं गोबरधन अमवसा क मेला अमवसा क मेला इहइ हउवै भइया अमवसा क मेला॥
केहू शाल सुइटर दुशाला मोलावै केहू बस अटैची क ताला मोलावै केहू चायदानी पियाला मोलावै सोठउरा क केहू मसाला मोलावै नुमाइस में जातैं बदल गइलीं भउजी अ भइया से आगे निकल गइलीं भउजी हिंडोला जब आयल मचल गइलीं भउजी अ देखतै डरामा उछल गइलीं भउजी अ भइया बेचारू जोड़त हउवैं खरचा भुलइले न भूलै पकौड़ी क मरचा बिहाने कचहरी कचहरी क चिन्ता बहिनिया क गौना मसहरी क चिन्ता फटल हउवै कुरता फटल हउवै जूता खलित्ता में खाली केराया क बूता तबौ पीछे-पीछे चलत जात हउवन गदेरी में सुरती मलत जात हउवन अमवसा क मेला अमवसा क मेला इहइ हउवै भइया अमवसा क मेला॥
बीतें दिनों का कोई दौर ऐसा था, जब हमें कवि प्रदीप का स्वर 'बोरिंग' लगता था। वो ऊबड़-खाबड़ और नादान स्कूली दिन थे। अलमस्त दिन, पल भर में राय कायम कर लेने वाले दिन। उन दिनों जो कुछ पसंद था....या जो कुछ सुनते थे, आज उसके बारे में सोचकर हंसी आती है। बहरहाल...प्रदीप के गीत और उनके स्वर संसार से परिचय बहुत बाद में हुआ। पर उनके गाये गाने यहां-वहां खूब सुनने मिलते। जैसे भोपाल में पुल-पुख़्ता के पार छोटे-तालाब के किनारे बने देवी मंदिर के पास से गुज़रते हुए लाउड-स्पीकर ख़ूब जोर से सुनाता--'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान, कितना बदल गया इंसान' और तब के भोपाल में लोग उस घाट पर डुबकी लगा रहे होते।
उन दिनों में नानी के शहर तक की जाने वाली रेल-यात्राओं में जब तब डिब्बे में चढ़ आने वाले भिखारियों को प्रदीप के गीत गाने देखा। वो गाते 'तेरे द्वार खड़ा भगवान, भगत भर दे रे झोली'। परियों की कहानियों में हक़ीक़त का तड़का लगी उन रेलयात्राओं का हर साल भर इंतज़ार करते थे। और वहां जो गीत सबसे ज्यादा गूंजता, वो था--'पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द ना जाने कोई'....ये गीत एक नेत्रहीन बूढ़ा गाता--जो एकदम चीथडा कपड़े पहने लड़के के कंधे पर हाथ रखकर चलता जाता। बच्चा लाठी फर्श पर ठोंकता और उससे बंधा घुंघरू 'छम छम' करता। लोग मूंगफलियां छील रहे होते और छिलके उसी फर्श पर बिखेर रहे होते। कोई पूछता कौन-सा स्टेशन आवे वालो है--जवाब मिलता—'पथरिया'।
उन दिनों सत्यनारायण की पूजा वाले घरों में लडियां लगाकर रोशनी की जाती। और बिजली के खंभों पर भोंपू की शक्ल वाले स्पीकर टांग दिये जाते। जिन पर लिखा होता--'फलाना टेन्ट हाउस'। ये भोंपू कभी 'मैं तो आरती उतारूं रे' बजाते। तो कभी उनसे आवाज़ का दरिया बहता--'कोई लाख करे चतुराई समय का लेख मिटे ना रे भाई'। या 'दूसरों का दुखड़ा दूर करने वाले तेरे दुख दूर करेंगे राम'।
वो बाल-सभाओं वाले दिन थे। तब डिज़्नी और पोगो ने दृश्यों और संवादों की आंधी नहीं चलायी थी। इंद्रजाल कॉमिक्स और चंपक-नंदन-चंदामामा ज़रूर बाल-जीवन का अटूट हिस्सा थे। उन दिनों में बाल-सभाओं में अपनी बारी का बेसब्री से इंतज़ार करते हुए अपने किसी सहपाठी को गाते हुए सुनते--'दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल'....और बस... परफॉर्म करने की घबराहट में हॉल में बिछी दरी के रेशे निकालकर उन्हें मरोड़ते रहते। तभी किसी दूसरे साथी का नाम पुकारा जाता, और वो गाता--'आओ बच्चो तुम्हें दिखायें झांकी हिंदुस्तान की वंदे-मातरम्'। तब पता नहीं था कि आसपास बिखरे ये गीत दरअसल या तो प्रदीप ने लिखे हैं या ये उनके गाये गीत हैं।
पर धीरे-धीरे वो अच्छे लगने लगे। मन में उनके लिए जगह बनती रही।
आज प्रदीप का जन्मदिन है। किसी ने याद दिलाया--तो बरबस ही उनके ये गाने ज़ेहन में ताज़ा हो गये। दरअसल कभी-कभी अचानक ही किसी कलाकार की भूली-बिसरी याद का मौसम आ जाता है। अभी पिछले ही हफ्ते तो 'छायागीत' के लिए गानों को चुनते वक्त एक गाना सामने आ खड़ा हुआ था--और हमें ज़रा-सा अचरज हुआ कि ये गाना भी प्रदीप का है। वो गाना था फिल्म 'तलाक़' का...'मेरे जीवन में किरण बनके बिखरने वाले, बोलो तुम कौन हो'। आशा भोसले और मन्ना डे ने इसे गाया है और प्रदीप के बोलों को स्वरबद्ध किया है सी. रामचंद्र ने। रूमानी गीतों के उस प्रोग्राम 'छायागीत' में हमारे चुने दो गीत प्रदीप के थे। दूसरा गीत था फिल्म 'जिंदगी और ख्वाब' का गीत--'ना जाने कहां तुम थे, ना जाने कहां हम थे'। दार्शनिक या देशभक्ति गीत लिखने का ठप्पा लगा हुआ है प्रदीप पर। जा़हिर है कि रूमानी गाने लिखने के मौक़े कम आये। पर उन्होंने ऐसे गाने भी अदभुत रचे हैं।
उन्हें 'ऐ मेरे वतन के लोगों' के लिए याद किया जाता है। इसकी जोड़ का दूसरा गीत नहीं रचा गया है। बॉम्बे टॉकीज़ की फिल्म 'किस्मत' में उनके लिखे गाने 'दूर हटो ऐ दुनिया वालो' ने अंग्रेज़ सरकार को परेशान कर दिया था। बैन लगा। हटा। लेकिन इस गाने ने भी एक जन-गीत का दर्जा पा लिया। जब उन्हें 'दादा साहेब फालके' दिये जाने की घोषण हुई--तो हर्ष की लहर दौड़ गयी थी। तब हम विविध भारती आ चुके थे। पर प्रदीप से मिलने का कभी मौक़ा नहीं आया। इसका सदा अफसोस रहेगा।
कवि प्रदीप ज्यादातर अपने लिखे गानों की धुन स्वयं बनाते थे। और ज्यादातर संगीतकार उन्हें अपना लेते थे। आज के शोर भरे समय में शायद इसलिए अच्छे लगते हैं--क्योंकि उनमें एक सादगी है। एक ईमानदारी है। उनका स्वर एक वीतराग साधु का स्वर लगता है। शायद प्रदीप हमें कोलाहल भरी दुनिया में सुकून का एक छोटा-सा कोना देते हैं।
song: dekh tere sansaar ki haalat. singer: pradeep lyrics: pradeep music: c. ramchandra film: nastik (1958) duration: 3 21
निदा फ़ाज़ली को पद्म-श्री देने की घोषणा हो गयी है। वे हमारे समय के महत्त्वपूर्ण शायर और गीतकार हैं। ये समझना थोड़ा मुश्किल है कि फिल्म-संसार में उनकी पारी लंबी और हरी-भरी क्यों नहीं रही--फिर भी शुक्रगुज़ार होना चाहिए निदा फ़ाज़ली का...कि उन्होंने हमें अपनी तन्हाईयों का साथ देने वाले कुछ नायाब गाने दिये। चाहे 'रजिया सुल्तान' का कब्बन मिर्जा़ का गाया गाना--'तेरा हिज्र मेरा नसीब है' हो या फिर 'आप तो ऐसे ना थे' का 'तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है' या फिर 'स्वीकार किया मैंने' का 'अजनबी कौन हो तुम'...इस तरह के गानों की एक लंबी फेहरिस्त है। मुमकिन हुआ तो हम 'रेडियोवाणी' पर निदा के कई गीत एक के बाद एक सुनवायेंगे।
लेकिन निदा के सबसे अच्छे अशआर ग़ैर-फिल्मी ग़ज़लों की शक्ल में नुमाया हुए हैं और ये सहज भी है। ग़ज़लों में वो एक आज़ाद शायर होते हैं--धुनों या अलफ़ाज़ की क़ैद से दूर। जहां वो अपने मन की बात कह सकते हैं। ऐसी ग़ज़लों की भी लंबी फेहरिस्त है। बहरहाल.... जब निदा को जगजीत की आवाज़ मिली है तो जैसे एक तिलस्म रच गया है।
निदा मन की कंदराओं में छिपे दर्द को सहलाने वाले शायर हैं। ग्वालियर से मुंबई तक का ऊबड़-खाबड़ सफ़र तय करने वाले निदा ने अपनी शायरी को आम आदमी से जोड़ा। ख्वाबों-ख्यालों, हुस्न और इश्क़ की बजाय उन्होंने जिंदगी के कडियल सफ़र को अलफ़ाज़ में उतारा। वो टूटते हुए रिश्तों, धर्म की ख़तरनाक ज़ंजीरों, सरहदों, मां, बच्चों और रोज़मर्रा की जाने किन किन चीज़ों पर लिखा है।
उनकी ये ग़ज़ल देखिए--
बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता।। सब कुछ तो है क्या ढूंढती रहती हैं निगाहें क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यों नहीं जाता।। मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यों नहीं जाता।। वो नाम जो बरसों से ना चेहरा है ना बदन है वो ख्वाब अगर है तो बिखर क्यों नहीं जाता।।
निदा ने दोहों पर भी प्रयोग किये हैं।
मैं रोया परदसे में भीगा मां का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार।।
सीता-रावण-राम का करें विभाजन लोग एक ही तन में देखिए तीनों का संजोग
बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान।
सीधा-सादा डाकिया जादू करे महान एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान
सबकी पूजा एक-सी, अलग-अलग हर रीत मस्जिद जाये मौलवी, कोयल गाये गीत।।
निदा के ये दोहे अनूठा प्रयोग हैं। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में दोहों की पुनर्खोज। उनकी आवाज़ में ये दोहे यहां सुने जा सकते हैं।
आज हम निदा की एक नायाब ग़ज़ल लेकर आये हैं जिसे जगजीत सिंह ने गाया। इसे आपने दूरदर्शन वाले ज़माने में (शायद 1991 के आसपास) डॉ राही मासूम राजा के लिखे मशहूर सीरियल 'नीम का पेड' के शीर्षक-गीत के रूप में काफी सुना होगा। निदा की इस बेहद मानीख़ेज़ ग़ज़ल को जिस इन्टेन्स तरीक़े से जगजीत ने गाया है, उससे ये रचना आपके भीतर ठहर जाती है। आप इससे बहुत देर तक बाहर नहीं आ पाते।
ghaza: Munh ki baat sune har koi album: MARASIM singer: jagjit singh shayar: Nida Faazli duration: 6:06
मुंह की बात सुने हर कोई दिल का दर्द जाने कौन आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन
सदियों-सदियों वही तमाशा, रस्ता-रस्ता लंबी खोज लेकिन जब हम मिल जाते हैं खो जाता है जाने कौन।। वो मेरा आईना है, मैं उसकी परछाईं हूं मेरे ही घर में रहता है, मुझ जैसा ही जाने कौन।। किरन-किरन अलसाता सूरज, पलक-पलक खुलती नींदें धीमे-धीमे बिखर रहा है, ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन।।
रेडियोवाणी की कुछ पुरानी पोस्टों पर गीत बज नहीं रहे हैं । इसकी वजह है उनकी 'होस्ट-साइट' का बंद हो जाना । कोशिश यही है कि जल्दी ही इन गीतों को फिर अपलोड करके आपको सुनवाया जाए । ले आउट बदलने की वजह से कुछ पुरानी पोस्टों की सामग्री अस्त-व्यस्त नज़र आ सकती है । इसे भी धीरे-धीरे सही करने का प्रयास है