Friday, October 2, 2009

सभी सुख दूर से गुज़रें : आरंभ फिल्‍म का गीत । मुकेश की आवाज़ । हरीश भादानी को विनम्र श्रद्धांजली

रेडियोवाणी पर मन्‍ना दा के बारे में अपनी नई पोस्‍ट की तैयारी कर ही रहा था कि तभी जयपुर से भाई प्रेमचंद गांधी का मेल आया । हरीश भादानी नहीं रहे ।  हरीश जी को मैं ज्‍यादा नहीं जानता । उनकी कुछ रचनाएं ज़रूर पढ़ी हैं । प्रेम भाई ने उनके फिल्‍म 'आरंभ' के गीत के बारे में भी बताया जो फ़ौरन ही उपलब्‍ध हो गया ।

हरीश जी के बारे में प्रेमचंद गांधी ने
यहां विस्‍तार से लिखा है । इसके अलावा किशोर चौधरी की इस पोस्‍ट को भी पढ़ा जाना ज़रूरी है ।

फिल्‍म 'आरंभ' सन 1976 में आई थी । संगीतकार थे आनंद शंकर । इस गाने को मुकेश ने गाया है । सुनिए ।

ये इस गीत का लगभग ढाई मिनिट वाला संस्‍करण है । यानी इसके कुछ अंतरे गीत में नहीं हैं, पर अपने लालित्‍य में ये सचमुच अनमोल है ।



सभी सुख दूर से गुज़रें गुज़रते ही चले जाएं
मगर पीड़ा उमर भर साथ चलने को उतारू है
सभी दुख दूर से गुज़रे ...
हमारा धूप में घर छाँव की क्या बात जानें हम
अभी तक तो अकेले ही चले क्या साथ जानें हम
बता दें क्या घुटन की घाटियाँ कैसी लगीं हमको
सदा नंगा रहा आकाश क्या बरसात जानें हम
बहारें दूर से गुज़रें गुज़रती ही चली जाएं
मगर पतझड़ उमर भर साथ चलने को उतारू है
सभी दुख दूर से गुज़रे ...
अटारी को धरा से किस तरह आवाज़ दे दें हम
मेंहदिया पाँव को क्यों दूर का अन्दाज़ दे दें हम
चले शमशान की देहरी वही है साथ की संज्ञा
बरफ़ के एक बुत को आस्था की आँच क्यों दें हम
हमें अपने सभी बिसरें बिसरते ही चले जाएं
मगर सुधियाँ उमर भर साथ चलने को उतारू है
सभी दुख दूर से गुज़रे ...
सुखों की आँख से तो बांचना आता नहीं हमको
सुखों की साख से तो आँकना आता नहीं हमको
चलें चलते रहें उमर भर हम पीर की राहें
सुखों की लाज से ढांपना आता नहीं हमको
निहोरे दूर से गुज़रें गुज़रते ही चले जाएं
मगर अनबन उमर भर साथ चलने को उतारू है
सभी दुख दूर से गुज़रे ...

रेडियोवाणी पर हम हरीश भादानी को विनम्र श्रद्धांजली अर्पित करते हैं ।

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नथली से टूटा मोती रे : मन्‍ना डे का ग़ैर-फि़ल्‍मी गीत ।।

ये शायद 1986 से 1988 के बीच के किसी साल की बात है । दूरदर्शन के दोपहर के प्रसारण में black and white era के कुछ नायाब गाने दिखाए जाते थे । इसमें कुछ ऐसे गाने हुआ करते थे जो ना हमने कभी देखे थे और ना सुने थे । ऐसे गानों में शामिल थे --मन्‍ना डे का गाया 'चलता चल' ( फिल्‍म 'फैशनेबल वाइफ' इसे जल्‍दी ही हम रेडियोवाणी पर सुनवाएंगे ), मन्‍ना दा का ही गाया 'रहने को घर दो' ( फिल्‍म 'बीवी और मकान' ) वग़ैरह ।
यहां पूरी फेहरिस्‍त दे दें तो अपने मन की बात कब कहें, बताईये आप ।

बहरहाल । ये वो उम्र थी जब हम नौंवी दसवीं या ग्‍यारहवीं जैसे कक्षाओं में विज्ञान की पढ़ाई से जूझते थे और सोचते थे कि इस 'मुई' पढ़ाई का कोई विकल्‍प नहीं हो सकता । जैसे कि हम 'गिटार' सीखें पांच साल और फिर जिंदगी भर गिटार बजाकर इज्‍ज़त से रोज़ी-रोटी कमाएं । हमारे इन ख़यालात को ना सिर्फ़ हमारे दोस्‍त और घर वाले बल्कि हम ख़ुद भी संदेह और हिकारत की नज़र से देखते थे । कंफूजियाने की उम्र थी ये । और हम अपनी जिंदगी में मन्‍ना दा (और तलत महमूद ) को 'discover' कर रहे थे ।
'भए भंजना' सुनते थे तो जब मन्‍ना दा 'दरस तेरे मां.....गे ये तेरा पुजारी' की तान छेड़ते....हमारे दिल में एक ख़ला, एक निर्वात, एक वैक्‍यूम बन जाता था । जब मन्‍ना दा गाते 'अभी तो हाथ में जाम है' (फिल्‍म सीता और गीता) और हम बाद में अपनी ही तरंग में इसे गुनगुनाते तो घर वाले हम से रही सही उम्‍मीद भी छोड़ देते थे । धीरे-धीरे मन्‍ना डे की हम शैदाई उनके 'usual' गानों से थोड़े दूर आ गए । 'कुछ अलग-कुछ नए' की 'चिरंतन-तलाश' ने हमें कहां-कहां नहीं भटकाया । स्‍कूल के ज़माने में ही श्रवण हळवे ने 'मधुशाला' की कैसेट दी तब हमें पता चला कि 'बच्‍चन' की जिस पुस्‍तक के हम यूं ही 'शैदाई' बन चुके थे, उसकी चुनिंदा रूबाईयों को हमारे प्रिय गायक ने गाया भी है । फिर तो पंडित नरेंद्र शर्मा, बच्‍चन जी और जयदेव के इस प्रोजेक्‍ट के तमाम किस्‍से खोद-खोदकर निकाल लिए हमने ।

'मधुशाला' के बाद बारी थी मन्‍ना डे के ग़ैर-फिल्‍मी गीतों की दुनिया में घुसने की । जबलपुर जैसे एकदम सुस्‍त शहर की एक कैसेट-शॉप में जब display में मन्‍नादा के ग़ैर-फिल्‍मी गीतों का 'डबल-कैसेट-अलबम' नज़र आ गया तो अपने 'तंग-जेबख़र्च' के बावजूद उसे ख़रीद लिया । एक नई दुनिया खुली ।
'नाच रे मयूरा', 'सावन की रिमझिम में थिरक-थिरक नाचे मयूरपंखी सपने', 'मेरी भी एक मुमताज थी', 'शाम हो जाम हो सुबू भी हो', 'चंद्रमा की चांदनी से भी नरम', 'नथली से टूटा मोती रे', 'ओ रंगरेजवा', 'हैरां हूं ऐ सनम'.......हमारे रिकॉर्डर पर ये कैसेट्स इतनी बार चलीं कि हमारे संस्‍कारों में समाहित हो गए हैं ये तमाम गीत । मन्‍ना दा हमारे लिए एक गायक नहीं रहे, वो हमारी जीवन का हिस्‍सा बन गए । वो इस भयानक, चालबाज़, नकली और बेहद शातिर संसार में हमारे लिए विश्‍वास की किरण बन गए ।

स्‍टेज-शोज़ में उन्‍हें देखना हमारे लिए एक 'दिव्‍य-अनुभव' बन गया । जब मुंबई के सेंन्‍ट एंडूज़ हॉल में मन्‍ना दा कविता कृष्‍णमूर्ति के साथ 'तू छिपी है कहां मैं तड़पता यहां' गा रहे थे तो यूं लग रहा था कि एक जुनूनी बुजुर्ग उम्र और गले की थकन को मात देने की ईमानदार कोशिश कर रहा है । पुराने ज़माने के किस्‍से उनसे सुनना भी एक 'दिव्‍य' अनुभव होता है । मुझे मुंबई में उनके घर पर उनसे मिलने का भी सौभाग्‍य प्राप्‍त है । अदभुत अनुभव था वो ।

मन्‍ना दा की आवाज़ में रेडियोवाणी पर आज आपको वो गीत सुनवाया जा रहा है जो अपनी रचना और अपनी गायकी दोनों में ही अनमोल है । कल जब मैंने 'फेसबुक' पर ये गीत चढ़ाया तो भाई प्रियंकर इसके गीतकार मधुकर राजस्‍थानी के बारे में कितने उत्‍साहित हुए पढिए ।


अरे वाह ! आपने मन्ना दा के साथ मधुकर राजस्थानी को भी याद कर लिया . मैं तो ’नथनी’ की जगह ’नथली’ देख-सुन कर ही समझ गया था कि किसी राजस्थानी का गीत है . मधुकर राजस्थानी के तो क्या कहने . उनके लिखे ’मैं ग्वालो रखवालो मैया’ तथा ’पांव पड़ूं तोरे श्याम’ आदि भजनों को तो रफ़ी साहब ने अमरता प्रदान कर ही दी है, जैसे मन्ना दा ने विप्रलंभ श्रंगार के इस अद्भुत गीत को . गीत-संगीत की दुनिया में हम आपकी बनाई पगडंडियों से जल्दी पहुंचते हैं .


मन्‍ना दा ने इस गाने को अद्भुत रंग दिया है । हैरत है कि मधुकर राजस्‍थानी के बारे में हमें ज्‍यादा जानकारियां नहीं मिलतीं । जबकि उन्‍होंने अपने समय में शानदार गैर-फिल्‍मी गीत दिये, जिनमें से कुछ का जिक्र तो प्रियंकर जी ने कर ही दिया है । आपमें से कोई उनके बारे में विस्‍तार से बता सके तो मज़ा आ जाए ।

तो आईये सुनते हैं 'नथली से टूटा मोती रे' ।



एक और प्‍लेयर ताकि सनद रहे । 


सजनी, सजनी

नथली से टूटा मोती रे
कजरारी अँखियां रह गईं रोती रे \-२
नथली से टूटा मोती रे


रूप की अगियाऽऽ आऽऽ
रूप की अगिया रूप की अगिया अंग में लागी
अंग में लागी कैसे छुपाए,
लाज अभागी, लाज अभागी
मनवाऽऽ कहताऽऽ भोर कभी ना होती रे
कजरारी अँखियाँ रह गईं ...
बोली दुल्हनिया पलकें झुकाएऽऽ
पलकें झुकाए घूँघटवा में सहमे लजाये

सहमे लजाये बलमाऽऽ पढ़ाएऽऽ
प्रीत की पहली पोथी रे कजरारी अँखियाँ रह गईं ...
lyrics corutesy:

http://lyricsindia.net/songs/show/9287

मन्‍ना दा को दादा साहेब फालके पुरस्‍कार मिलने की घोषणा हम सब के लिए हर्ष का विषय है । असंख्‍य बधाईयां ।

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Saturday, September 26, 2009

घिरी घटाएं आसमान पर : लता मंगेशकर का ग़ैर-फिल्‍मी गीत । जन्‍मदिन पर विशेष ।

 

 

 

 

 

लता मंगेशकर की आवाज़ तमाम विशेषणों से ऊपर है । उनके जन्‍मदिन पर 'रेडियोवाणी' के ज़रिए हम आपके लिए उनकी एक ग़ैर-फिल्‍मी रचना लेकर आए हैं । अपने ग़ैर-फिल्‍मी गीतों में लता मंगेशकर का स्‍वर एकदम अलग ही रहा है । हालांकि उनके ज्‍यादा ग़ैर-फिल्‍मी अलबम नहीं आए हैं । आपको याद होगा कि लता जी ने ग़ालिब की ग़ज़लों का एक अलबम जारी किया था । जिसके संगीतकार उनके भाई हृदयनाथ मंगेशकर थे । इससे पहले के.महावीर ने उनका एक ग़ैर-फिल्‍मी एलबम तैयार किया था । जो सन 1973 में आया था । जिसमें शकील बदायूंनी की ग़ज़ल 'आंख से आंख मिलाता है कोई',अभिलाष के गीत 'आज की रात ना जा रे' और 'सांझ भई घर आ जा रे' शामिल थे ।

''वर्षा-ऋतु'' नामक जिस अलबम से हमने ये गीत लिया है, वो सन 1969-70 में जारी किया गया था । कई संगीतकार, कई गीतकार और कई गायक इसमें शामिल थे । इसमें मन्‍ना डे के स्‍वर में पंडित नरेंद्र शर्मा की रचना 'नाच रे मयूरा' शामिल थी तो दूसरी तरफ लक्ष्‍मी शंकर, सुमन कल्‍याणपुर और सखियों का गाया गीत था 'बीत जात वर्षा ऋतु पिया नहीं आए ऐ
री' । इसके अलावा 'अमृत धरती पर लाए' (तलत महमूद), सावन मास (मुबारक बेगम), कोयलिया उड़ जा (मुकेश), निबुआ तले डोला (सुधा मल्‍होत्रा), बरसन लागी सावन बुंदियां (बेगम अख्‍तर) जैसी रचनाएं शामिल थीं । इस अलबम को कालजयी होने से भला कौन रोक सकता था । आज भी ये सी.डी. की शक्‍ल में उपलब्‍ध है

बहरहाल सुनिए लता जी की आवाज़ में ग़ैर-फिल्‍मी गीत --घिरी घटाएं ।
song-ghiri ghatayen aasman par
singer-lata mangeshkar
lyrics-sumitra kumar lahiri
music-hridaynath mangeshkar
duration- 4 min.




एक और प्‍लेयर ताकि सनद रहे । 

 



 


ये रहे इस गाने के बोल

घिरी घटाएं आसमान पर पिय की याद जगाएं रे
उमड़-घुमड़ कर शोर मचाते जैसे बादल काले
वैसे ही तो छल-छल छलके दो नैना मतवाले
मद से भरी पीर बरसाती चलने लगी हवाएं
पिय की याद जगाएं रे ।।
अमराई की घनी डालियों पर कोयलिया कारी
हूक उठाकर, आग लगाकर ढुलकाती मधु-प्‍याली
हिंडोले झूल नवेली, सखियां कजरी गाएं
पिय की याद जगाएं रे ।।
  

अगले दो दिन इंदौर में बीतेंगे । कुछ ब्‍लॉगरों से मुलाक़ात मुमकिन है ।

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Thursday, September 24, 2009

आईये सुनें शंकर-जयकिशन के नायाब instrumental अलबम raga jazz style से राग तोड़ी

रेडियोवाणी के नियमित पाठक अब तक जान गए होंगे कि हम वाद्य-संगीत यानी instrumental music और वाद्यों दोनों के ही ख़ासे शैदाई हैं । अपने चिट्ठों पर पहले भी अधूरी-‍तमन्‍नाओं का जिक्र कर चुके हैं जिनमें से एक है गिटार सीखना । इस तमन्‍ना को पूरा करने के लिए हम अभी-भी बेक़रार हैं । बहरहाल...पिछले दिनों भाई दिलीप कवठेकर ने अपने इस पोस्‍ट में एक ऐसे संग्रह की याद दिला दी...जिसे विविध-भारती में आने के बाद पहली बार सुना था । और वो भी अपने सहयोगी कमल शर्मा के सौजन्‍य से । उन्‍होंने ही  संग्रहालय से इस रिकॉर्ड को निकालकर सुनाया था । शुरूआती दिनों में बहुत समय तक हैलो-फ़रमाईश के पहले फिलर के रूप में इसी रिकॉर्ड से 'राग तोड़ी' वाले 'कट' की धुन बजती रही ।

बहरहाल....... ये रिकॉर्ड है RAGA JAZZ STYLE. इसका 'कवर'
इस ब्‍लॉग के सौजन्‍य से यहां लगाया जा रहा है ।
(लिंकित-ब्लॉग 'सितार-ड्रीम' मुझे ग़ज़ब का जुनूनी ब्‍लॉग लगा । बंदे ने अपना प्रोफाइल तक नहीं दिया है, काम शानदार और एप्रोच एकदम minimalist )
jazz_raga सन 1968 में जारी Raga jazz style कमाल का concept है । दरअसल इस रिकॉर्ड में जीनियस-जोड़ी शंकर जयकिशन ने jazz music और भारतीय शास्‍त्रीय संगीत का कमाल का fusion किया है । फिल्‍म-संसार में ये बात प्रचलित है कि एक समय फिल्‍म-उद्योग के सारे साजिन्‍दे हड़ताल पर चले गये थे । चूंकि कोई रिकॉर्डिंग हो नहीं सकती थी इसलिए शंकर जयकिशन ने सितार वादक उस्‍ताद रईस ख़ान के साथ मिलकर ये रिकॉर्ड तैयार किया था । कुछ लोग कहते हैं कि इसमें जो साज़ बजाए गए हैं वो आकाशवाणी के स्‍टाफ-आर्टिस्‍टों ने बजाए हैं । हालांकि मुझे इसमें ज़रा शक है । 

दिलीप भाई ने अपनी पोस्‍ट में कुछ साजिन्‍दों के नाम दिए हैं । मुमकिन है कि उनकी बात सही हो । उनके मुताबिक़ ये तस्‍वीर इसी अलबम की रिकॉर्डिंग की है । जिसे उन्‍होंने संगीत-विशेषज्ञ विश्‍वास नेरूरकर के संग्रह से प्राप्‍त किया है । img0601 इसमें उस्‍ताद रईस ख़ां साहब सितार पर नज़र आ रहे हैं । काले चश्‍मे में हमारे बेहद प्रिय मनोहारी दादा है ( जिनसे कई बार मिलने और बेहद लंबा इंटरव्‍यू करने का सौभाग्‍य मुझे प्राप्‍त है )  सबसे दाहिनी तरफ जयकिशन जी हैं । ड्रम्‍स पर हैं लेसली गोदिन्‍हा । दिलीप भाई ने बाकी वादकों के नाम भी लिखे हैं, जिनकी पुष्टि की जानी चाहिए । उनके मुताबिक़ तबला बजाया था अनंत नैयर और

रमाकांत ने । ट्रम्‍पेट ज़ोन परेरा ने ।  bass की जिम्‍मेदारी एडी ट्रैवर्स की थी । इलेक्ट्रिक गिटार पर थे दिलीप नाईक और एनीबाल कैस्‍ट्रो ने और बांसुरी बजाई थी सुमंत ने । शंकर जयकिशन के हमेशा के असिस्‍टेन्‍ट थे दत्‍ताराम नाइक और सेबेस्टियन डिसूज़ा । मेरी कोशिश है कि जल्‍दी ही विश्‍वस्‍त सूत्रों से इस बात की पुष्टि कर ली जाए ।

अब आपको बताया जाए कि इस रिकॉर्ड में असल में क्‍या है । कुल ग्‍यारह cut हैं इसमें । बेहतर है कि इन कट्स की लिस्‍ट ही पेश कर दी जाए ।


1. राग तोड़ी                           2. राग भैरव                           3. राग मालकौंस

 
4. राग कलावती                     5. राग तिलक कामोद               6. राग मियां की मल्‍हार
7. राग बैरागी                         8. राग जयजयवंती                  9. राग मिश्र पीलू
10. राग शिवरंजनी                 11. राग भैरव

यक़ीन मानिए इसे सुनना अपने आप में एक दिव्‍य अनुभव है । दिलीप भाई कहते हैं कि वो इसकी तलाश में हैं । हम कहते हैं कि आपने ठीक से तलाशा ही नहीं । इतरा नहीं रहे हैं पर बता रहे हैं कि ये सी.डी. हमारे संग्रह का हिस्‍सा है । और आपको बता दें कि इसे हमने खुद एच.एम.वी. के वेयर-हाउस जाकर ख़रीदा था । मुंबई के बाहर नवी-मुंबई के एक सुदूर औद्योगिक-इलाक़े में है ये वेयर-हाउस । इसके अलावा भायखला में भी इसकी एक शाखा है । हमारी जानकारी कहती है कि आपको इतना कष्‍ट उठाने की ज़रूरत नहीं होगी । hamaracd.com से इसे देश-विदेश में आसानी से प्राप्‍त किया जा सकता है ।

तो आईये 'राग तोड़ी' सुनें । हम शास्‍त्रीय-संगीत के ज्ञाता नहीं हैं । इसलिए इस धुन की बारीकियों को नहीं समझते । पर इतना जानते हैं कि जब सितार की ठुमकदार चाल के बाद बांसुरी यूं तान छेड़ती है जैसे किसी गोरी का आंचल हवा के एक झोंके-से लहरा गया हो, तो आप इस तान के साथ बह जाते हैं और अचानक ही ड्रम्‍स और सेक्‍सॉफोन वग़ैरह की तरंगें आपको चौंका देती हैं । इसके बाद आप दुनिया की शोरो-गुल से कटकर थोड़ी देर के लिए ध्‍यान की अवस्‍था में पहुंच जाते हैं । अगर हमें कभी हिमालय पर थोड़े दिन के लिए जाना पड़े तो इस सीडी को अपने साथ लेकर जाना चाहेंगे । ( तोड़ी की ये धुन वही है जो विविध-भारती पर हैलो फ़रमाईश के ठीक पहले फिलर के रूप में बजती थी )  राग तोड़ी के बारे में जानकारियां पाईये यहां, नचिकेता शर्मा के सौजन्‍य से । और यहां डॉ. पी.पी. नारायणस्‍वामी के सौजन्‍य से ।

Album: Raga jazz style (Classical Instrumental)
No. CDNF 150134
Artists: Shankar Jaikishan and Others
Cut title: Raga todi
Duration: 3:43

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एक और प्‍लेयर ताकि सनद रहे ।



जाहिर है कि आपकी इस अलबम के अन्‍य कट्स को सुनने की इच्‍छा होगी । तो इसका भी एक अड्डा मैंने खोज निकाला है । यहां क्लिक करें । रेडियोवाणी पर आजकल संगीत-पहेली का सिलसिला शुरू किया गया है । अगली संगीत-पहेली जल्‍दी ही आएगी ।

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Sunday, September 20, 2009

धार धार बरसे- छाया गांगुली फिल्‍म थोड़ा-सा रूमानी हो जाएं

अनेक कारणों से 'थोड़ा सा रूमानी हो जाएं'  हमारी पसंदीदा फिल्‍म रही है । इस समय हम पुरानी पोस्‍टों की लिस्‍ट में घुसकर पुराना संदर्भ निकालने के 'मूड' में नहीं हैं । पर मुमकिन है  कि 'रेडियोवाणी' पर इसके कुछ गीत मौजूद हों । बल्कि हमें पूरा यक़ीन है । हमें लगता है कि पुरानी पोस्टों के मोह को भुला कर आगे बढ़ने में ही भलाई है । ख़ैर....बारिश के दिनों से ही हम 'रेडियोवाणी' पर इस गाने को चढ़ाना चाहते थे । छाया गांगुली की गाढ़ी आवाज़ में बारिश कुछ और सोंधी लगती । पर कमबख्‍़त मौसम ने वो दग़ा दिया है कि बंबई शहर में पानी की किल्‍लत हो गयी । ऐसे में 'धार-धार बरसे' आसमान से बरसती बूंदों पर क़तई लागू नहीं होता । लेकिन 'जिया जब झूमे सावन है' की तर्ज़ पर बे-मौसम बारिश का गीत सुनिए । और इसलिए सुनिए कि इसे कभी भी सुना जा सकता है ।


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Sunday, September 13, 2009

आईये सुनें 'चल उड़ जा रे पंछी'- रफ़ी नहीं तलत की आवाज़ में

गानों की खोजबीन का सिलसिला ऐसा है कि ये अकसर आपको हैरत में डाल देता है । आज हम आपको जो गाना सुनवाने जा रहे हैं वो तकरीबन तीन-चार महीने पहले ही 'इंटरनेटी-यायावरी' में हमारे सामने अचानक आ गया था और हम 'ठिठक' गए थे । हुआ यूं कि एक दिन रेडियो पर हम फ़रमाईशों का 'फोन-इन' कार्यक्रम 'हैलो फ़रमाईश' कर रहे थे तो एक सुधि-श्रोता ने अजीब-सी फ़रमाईश की, जो 'बाउंसर' जैसी लगी । बोले--'चल उड़ जा रे पंछी' सुनवा दीजिए । लेकिन हमें ये गाना रफ़ी साहब की आवाज़ में नहीं बल्कि तलत महमूद की आवाज़ में सुनना है ।

उन्‍हें लगा था कि या तो वो गाना विविध-भारती के पास होगा, या फिर हम बग़लें झांकने लगेंगे, क्‍योंकि फिल्‍म के रिकॉर्ड पर ये गीत है नहीं और बहुत ही चुनिंदा लोगों को इस संस्‍करण के बारे में पता है । जब मैंने उनसे कहा कि भाईसाहब ये गाना फिल्‍म के रिकॉर्ड पर नहीं है...तो वो अड़ गये कि हमने तो बहुत बार सुना है । आपने ठीक से देखा नहीं होगा, ज़रा फिर से 'चेक' कीजिए । तब मजबूर होकर हमें उन्‍हें इस गीत की कहानी सुनानी पड़ी । जो आप भी सुन लीजिए ।  ये कहानी मुझे फिल्‍म-संसार के एक मशहूर संगीत-निर्देशक ने बताई थी । 

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Saturday, August 29, 2009

संगीत की तरंगित बातें और एक instrumental पहेली

एक बार विविध-भारती पर संगीतकार ख़ैयाम ने कहा था कि संगीत एक इबादत है जिसे लोग भूलते जा रहे हैं ।



अब आप बताईये कि सही कहा था या ग़लत । आज की इस पोस्‍ट का ख़ैयाम साहब की इस बात से कोई ख़ास लेना-देना नहीं है । आज तो हम अपने मन की
'तरंग' में हैं । लेकिन चूंकि 'तरंग' पर हम संगीत नहीं चढ़ाते इसलिए अपने मन की ये तरंग यहां ठेले दे रहे हैं । जीवन में इत्‍ता सारा संगीत सुन लो कि दिमाग़ में बस 'सारेगामा' ठुंसा पड़ा रहे, तो यही होता है । फिल्‍मी-संगीत सुनो, इल्‍मी  सुनो, पॉप सुनो, रॉक सुनो, रैप सुनो, फिर चलो 'लेटिन अमरीका' और ज़रा वहां की तरंगों में झूम लो । फिर बुंदेलखंड में 'खुरई' पहुंच जाओ और सुनो 'मेरी बऊ हिरानी है ऐ भैया मुझे बता दैयो' । इत्‍ते में जी ना भरे तो 'दमोह' पहुंच जाओ और सुनो 'बैरन हो गयी जुन्‍हैया मैं कैसी करूं' । बुंदेलखंड से जी ऊब गओ हो तो चलो उत्‍तरप्रदेश पहुंच जाएं और गाएं--'पहिने कुरता पर पतलून आधा फागुन आधा जून' । कमी तो है नहीं लोक-संगीत की । राजस्‍थान चलें और गाएं 'डिग्‍गीपुरी के राजा' । अब चलें हरियाणा और सुनें--'तू एक राजा की राजदुलारी मैं सिर्फ लंगोटे वाला सूं । फिर महाराष्‍ट्र राज्‍य में आ जाओ और सुनो--'मी डोलकर दरयाचा राजा' । पंजाब पहुंच जाओ-'बारी बरसी खटन गयासी' पर 'बल्‍ले-बल्‍ले' कर लो ।




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रेडियोवाणी की कुछ पुरानी पोस्टों पर गीत बज नहीं रहे हैं । इसकी वजह है उनकी 'होस्ट-साइट' का बंद हो जाना । कोशिश यही है कि जल्दी ही इन गीतों को फिर अपलोड करके आपको सुनवाया जाए । ले आउट बदलने की वजह से कुछ पुरानी पोस्‍टों की सामग्री अस्‍त-व्‍यस्‍त नज़र आ सकती है । इसे भी धीरे-धीरे सही करने का प्रयास है

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